जय और विजय – वैकुंठ के द्वारपाल

जय-वीरू की कहानी तो सब को याद होगी लेकिन किसी को जय-विजय की कहानी पता है? हमें विष्णु के दस अवतारों के बारे में भी पता है। लेकिन कितने लोगों को पता है की भगवान के इन अवतारों को चुनौती देने वाले दैत्यों की कहानी क्या है, जिनकी वजह से नारायण को बार-बार जन्म लेने पड़े। आज हम सूत्रधार में सुनेंगे ऐसी ही एक कहानी।

वैकुण्ठ के द्वारपालकों जय और विजय की इस कहानी में हम जानेंगे कि ऐसा क्या हुआ की उन्हें वैकुण्ठ त्यागना पड़ा और पाप योनि में जन्म लेना पड़ा। हम ये भी जानेंगे की कैसे जय और विजय के तार नारायण के अनेक अवतारों से जुड़े हुए हैं।

एक बार ब्रह्मा के प्रथम पुत्र और देवताओं के भी पूर्वज सनकादिक मुनिगण; सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार सम्पूर्ण लोकों से विरक्त होकर चित्त की शान्ति के लिये भगवान विष्णु के दर्शन करने हेतु उनके बैकुण्ठ लोक में गये। बैकुण्ठ के द्वार पर जय और विजय नाम के दो द्वारपाल पहरा दिया करते थे। जय और विजय ने इन सनकादिक ऋषियों को द्वार पर ही रोक लिया और बैकुण्ठ लोक के भीतर जाने से मना करने लगे।

उनके इस प्रकार मना करने पर सनकादिक ऋषियों ने कहा, “अरे मूर्खों! हम तो भगवान विष्णु के परम भक्त हैं। हमारी गति कहीं भी नहीं रुकती है। हम देवाधिदेव के दर्शन करना चाहते हैं। तुम हमें उनके दर्शनों से क्यों रोकते हो? तुम लोग तो भगवान की सेवा में रहते हो, तुम्हें तो उन्हीं के समान समदर्शी होना चाहिये। भगवान का स्वभाव परम शान्तिमय है, तुम्हारा स्वभाव भी वैसा ही होना चाहिये। हमें भगवान विष्णु के दर्शन के लिये जाने दो।” ऋषियों के इस प्रकार कहने पर भी जय और विजय उन्हें बैकुण्ठ के अन्दर जाने से रोकने लगे। जय और विजय के इस प्रकार रोकने पर सनकादिक ऋषियों ने क्रुद्ध होकर कहा, “भगवान विष्णु के समीप रहने के बाद भी तुम लोगों में अहंकार आ गया है और अहंकारी का वास बैकुण्ठ में नहीं हो सकता। इसलिये हम तुम्हें शाप देते हैं कि तुम लोग पापयोनि में जाओ और अपने पाप का फल भुगतो।” उनके इस प्रकार शाप देने पर जय और विजय भयभीत होकर उनके चरणों में गिर पड़े और क्षमा माँगने लगे।

यह जान कर कि सनकादिक ऋषिगण भेंट करने आये हैं भगवान विष्णु स्वयं लक्ष्मी जी के साथ उनके स्वागत के लिए पधारे। भगवान विष्णु ने उनसे कहा, “हे मुनीश्वरों! ये जय और विजय नाम के मेरे पार्षद हैं। इन दोनों ने अहंकार बुद्धि को धारण कर आपका अपमान करके अपराध किया है। आप लोग मेरे प्रिय भक्त हैं और इन्होंने आपकी अवज्ञा करके मेरी भी अवज्ञा की है। इनको शाप देकर आपने उत्तम कार्य किया है। इन अनुचरों ने तपस्वियों का तिरस्कार किया है और उसे मैं अपना ही तिरस्कार मानता हूँ। मैं इन पार्षदों की ओर से क्षमा याचना करता हूँ। सेवकों का अपराध होने पर भी संसार स्वामी का ही अपराध मानता है। अतः मैं आप लोगों की प्रसन्नता की भिक्षा चाहता हूँ।”

भगवान के इन मधुर वचनों से सनकादिक ऋषियों का क्रोध तत्काल शान्त हो गया। भगवान की इस उदारता से वे अति आनंदित हुये और बोले, “आप धर्म की मर्यादा रखने के लिये ही सबको इतना आदर देते हैं। हे नाथ! हमने इन निरपराध पार्षदों को क्रोध के वश में होकर शाप दे दिया है, इसके लिये हम क्षमा चाहते हैं। आप उचित समझें तो इन द्वारपालों को क्षमा करके हमारे शाप से मुक्त कर सकते हैं।”

भगवान विष्णु ने कहा, “हे मुनिगण! मै सर्वशक्तिमान होने के बाद भी आप लोगों के वचन को असत्य नहीं करना चाहता क्योंकि इससे धर्म का उल्लंघन होता है। आपने जो शाप दिया है वह मेरी ही प्रेरणा से हुआ है। ये अवश्य ही इस दण्ड के भागी हैं। ये दिति के गर्भ में जाकर दैत्य योनि को प्राप्त करेंगे और मेरे द्वारा इनका संहार होगा। ये मुझसे शत्रुभाव रखते हुये भी मेरे ही ध्यान में लीन रहेंगे। मेरे द्वारा इनका संहार होने के बाद ये पुनः इस धाम में वापस आ जायेंगे।”

इस प्रकार जय और विजय को तीन जन्मों तक पाप-योनि में जन्म लेना पड़ा और भगवान से अगाध शत्रुता के कारण सदैव नारायण के बारे में ही सोचते रहे। पहले जन्म में जय और विजय हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष के रूप में जन्मे और भगवान विष्णु ने वाराह अवतार लेकर हिरण्याक्ष तथा नृसिंह अवतार लेकर हिरण्यकशिपु का वध किया। अगले जन्म में उन्होंने रावण और कुम्भकर्ण के रूप में जन्म लिया और भगवान के राम अवतार के हाथों मारे गए। तीसरे और अंतिम जन्म में वे शिशुपाल और दंतवक्र के रूप में जन्मे तथा नारायण के कृष्ण अवतार के हाथों मृत्यु पाकर इस शाप से मुक्त होकर पुनः वैकुण्ठ में स्थान प्राप्त किया। 


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