कच-देवयानी की कथा – जब दैत्यगुरु की पुत्री हुआ प्रेम देवगुरु के पुत्र से 

महाभारत के अनंत महासागर में अनेकों रोचक कथाएं हैं जो शायद आप लोगों ने टीवी पर ना देखी हों। वैसी ही कथाओं में एक है देवयानी की। देवयानी की कथा का उल्लेख महाभारत के आदि पर्व में मिलता है। इस प्रसंग के तार पांडवों के पूर्वज ययाति से भी जुड़े हुए हैं। कथा के पहले भाग में हम सुनेंगे कच और देवयानी की एकतरफा प्रेम कहानी। 

बात समुद्र मंथन के पहले की है। अभी तक देवताओं ने अमृत पान नहीं किया था और वो अभी तक अमर नहीं हुए थे। देवता और दानव त्रिलोकों पर आधिपत्य के लिए आपस में लड़ते रहते थे। उस समय कश्यप ऋषि और दनु के पुत्र वृषपर्वा दानवों के राजा थे। उन्होंने भृगु ऋषि के पुत्र शुक्राचार्य को अपना गुरु नियुक्त किया और देवताओं ने अंगिरा ऋषि के पुत्र बृहस्पति को। 

जब भी देवताओं और दानवों में युद्ध होता शुक्राचार्य अपनी मृत संजीवनी विद्या से दानवों को फिर से जीवित कर देते। गुरु बृहस्पति यह विद्या नहीं जानते थे। इस प्रकार दानवों का पलड़ा भारी होने लगा था। दानव मृत्यु के भय के बिना देवताओं से युद्ध करते। देवताओं की संख्या कम होती जा रही थी और दानव की संख्या पर युद्ध का कोई असर नहीं होता था। 

देवताओं ने गुरु बृहस्पति से इस समस्या का समाधान निकालने को कहा। गुरु बृहस्पति ने अपने ज्येष्ठ पुत्र कच को बुलाकर उसे शुक्राचार्य से मृत संजीवनी सीखने को कहा, जिससे देवताओं का भला हो सके और उनको भी संजीवनी विद्या का लाभ मिल सके। कच ने अपने पिता की आज्ञा मानकर शुक्राचार्य के पास जाने का निश्चय किया। 

शुक्राचार्य दानवराज वृषपर्वा के यहाँ ही रहते थे। कच ने गुरु शुक्राचार्य के आश्रम में जाकर उनसे कहा,"गुरुदेव! मैं कच, गुरु बृहस्पति का पुत्र और प्रजापति अंगिरा का पौत्र आपकी शरण में रहकर आपसे दीक्षा लेना चाहता हूँ।"

कच की बात सुनकर शुक्राचार्य को खुद पर बड़ा ही गर्व हुआ की देवगुरु बृहस्पति का पुत्र उनसे दीक्षा लेना चाहता है। उन्होंने कच से कहा,"देवगुरु बृहस्पति मेरे लिए आदरणीय हैं। तुम्हारा यहाँ स्वागत है।" और उन्होंने कच को अपने आश्रम में रहकर ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए दीक्षा ग्रहण करने की अनुमति दे दी। 

कच शुक्राचार्य की आज्ञानुसार ब्रह्मचर्य व्रत का प्रण लेकर उनके आश्रम में रहने लगा। उसके व्यवहार से देवगुरु शुक्र और गुरुपुत्री देवयानी अत्यंत प्रसन्न रहते थे। 

जब दानवों को यह बात पता चली की बृहस्पति पुत्र कच गुरु शुक्राचार्य के आश्रम में उनसे दीक्षा ले रहा है, उनको कच पर संदेह हुआ। उनको लगा अगर कच ने किसी तरह शुक्राचार्य से मृत संजीवनी विद्या सीख ली तो उनको बड़ी समस्या हो जाएगी। ऐसा सोचकर एक दिन जब कच आश्रम की गायों को चराने गया हुआ था तब दानवों ने उसका वध कर दिया। 

शाम को जब सभी गायें बिना कच के ही आश्रम लौट आयीं तब देवयानी के कहने पर शुक्राचार्य कच को ढूंढ़ने निकल पड़े और उनको जंगल में कच का शव मिला। गुरु शुक्र ने अपनी मृत संजीवनी विद्या से कच को जीवित कर दिया। 

दानवों ने जब कच को जीवित देखा तो उन्होंने इस बार कच को मारकर उसके टुकड़े-टुकड़े करके भेड़ियों को खिला दिए। शुक्राचार्य ने फिर से अपनी विद्या का आव्हान किया और कच का एक-एक अंग भेड़ियों का पेट फाड़कर लिकल आया और कच फिर से जीवित हो गया। 

तीसरी बार दानवों ने एक नयी युक्ति सोची। इस बार उन्होंने कच को मरकर जला दिया और उसकी राख को वारुणी में मिलकर शुक्राचार्य को ही पीला दी। इस बार फिर जब बहुत समय तक कच नहीं आया तो देवयानी ने अपने पिता से कहा,"पिताजी! कच पूजा के लिए फूल लेने गया और अभी तक वापस नहीं आया। कहीं फिर से किसी ने उसे मार तो नहीं दिया?" 

शुक्राचार्य ने देवयानी से कहा,"पुत्री! मैं बार-बार कच को जीवित करता हूँ और दानव उसे हर बार मार देते हैं। अब मैं कब तक उसको जिन्दा करता रहूँगा?" 

देवयानी ने अपने पिता से कहा,"पिताजी! मैं कच के बिना जीवित नहीं रह सकती, आप कुछ भी करिये और उसे फिर से जीवित करिये।" 

गुरु शुक्राचार्य ने अपनी योग विद्या से जान लिया कि कच उनके पेट के अंदर है और अगर उन्होंने उसका आह्वान किया तो कच उनका पेट फाड़कर बाहर आ जायेगा और उनकी मृत्यु हो जाएगी। लेकिन अपनी पुत्री का दुःख उनसे देखा नहीं गया। गुरु शुक्र ने अपने पेट के अंदर ही कच तो मृत संजीवनी विद्या सिखाई और फिर उसका आह्वान किया। 

कच गुरु शुक्र का पेट फाड़कर बाहर आ गया और फिर गुरुदेव की सिखाई विद्या से उसने शुक्राचार्य को जीवित कर दिया। 

इस प्रकार कच का मृत संजीवनी विद्या सीखने का उद्देश्य पूरा हुआ और दानव जो नहीं चाहते थे उनकी ही वजह से वही हुआ। 

अब जब कच ने गुरुदेव से विदा मांगी तो देवयानी ने कच से कहा,"ऋषिकुमार! तुम हमेशा ही एक आदर्श शिष्य की तरह यहाँ रहे। अब तुम्हारी शिक्षा पूरी हुई और तुम्हारे ब्रह्मचर्य का प्रण भी पूरा हुआ। मैं तुमसे प्रेम करती हूँ। तुम मुझसे विवाह कर लो।"

कच ने देवयानी से कहा,"गुरुपुत्री! मैंने तुम्हारे पिता के पेट में वास किया है और उनके ही अंदर से मेरा पुनर्जन्म हुआ है। इस प्रकार वो मेरा पिता हुए और तुम मेरी बहन। मैं तुमसे विवाह नहीं कर सकता।"

देवयानी को कच की बात सुनकर बहुत क्रोध आया और वो बोली,"इस प्रकार तुम मेरा तिरस्कार करोगे तो तुम्हारी सीखी हुई विद्या कभी सिद्ध नहीं होगी।"

कच को देवयानी का ऐसे शाप देना अनुचित लगा और उसने कहा,"तुम्हारा तिरस्कार मेरे लिए धर्म के अनुरूप था, लेकिन तुमने काम के वशीभूत होकर मुझे शाप दिया है, इसलिए अब मैं भी तुम्हे शाप देता हूँ कि कोई भी ब्राह्मणकुमार तुमसे विवाह नहीं करेगा।"

इसके बाद कच कभी खुद मृत संजीवनी विद्या का उपयोग नहीं कर पाए लेकिन उन्होंने अपने शिष्यों को वह विद्या सिखा दी जिससे देवताओं को भी मृत संजीवनी का लाभ मिलने लगा। 

उसके बाद देवयानी का क्या हुआ? किससे हुआ देवयानी का विवाह? इन प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए सुनिए शर्मिष्ठा-देवयानी की कथा।


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