गरुड़ देव की जन्मकथा 

अपने नाग पुत्रों की सहायता से कद्रू ने छलपूर्वक विनता से बाजी जीत ली और विनता उसकी दासी बनकर रहने लगी। अपने पहले पुत्र अरुण के शाप के कारण दासत्व का जीवन व्यतीत करती हुई विनता उस शाप से मुक्ति पाने के लिए अपने दूसरे पुत्र के जन्म की प्रतीक्षा करने लगी।

समय आने पर विनता के दूसरे अंडे से महाशक्तिशाली गरुड़ पैदा हुए। उनकी शक्ति, गति, दीप्ति और वृद्धि विलक्षण थीं। आँखे बिजली की तरह पीली और शरीर अग्नि के समान तेजस्वी था। जब वो अपने विशालकाय पंख फड़फड़ाकर आकाश में उड़ते तो लगता स्वयं अग्निदेव आ रहे हैं। जब गरुड़ ने अपनी माता को नागमाता की दासी के रूप में देखा तो उनसे इसका कारण पूछा। विनता ने गरुड़ को कद्रू के साथ लगी बाजी के विषय में बता दिया। 

गरुड़ ने अपनी माता को इस शाप से मुक्त कराने की ठान ली और नागों के पास जाकर बोले,"मेरी माता को दासत्व से मुक्त करने के बदले में तुम्हे क्या चाहिए?" नागों ने बहुत सोच विचार करने के बाद गरुड़ से कहा,"हमारी माता के शाप के कारण हम जनमेजय के यज्ञ कुंड में भस्म हो जायेंगे। इससे हमे बचाने के लिए तुम हमारे लिए देवलोक से अमृत लेकर आ जाओ। अगर तुम देवलोक से अमृत लाने में सफल हो गए तो तुम्हारी माता दासत्व से मुक्त हो जाएँगी।"

गरुड़ देव ने नागों की बात मान ली और अमृत लेने के लिए स्वर्गलोक की और निकल पड़े। इन्द्र और अन्य देवताओं को जब इस बात का पता चला की गरुड़ अमृत लेने के लिए आ रहे हैं तो उन्होंने अमृत की रक्षा करने के लिए गरुड़ का सामना करने का निश्चय किया; परन्तु परम प्रतापी गरुड़ के सामने उनकी एक ना चली। गरुड़ ने अपने प्रहारों से इन्द्र समेत सभी देवताओं को मूर्छित कर दिया और अमृत तक पहुँच गए। 

गरुड़ जब अमृत पात्र लेकर आसमान में उड़े जा रहे थे तब भगवान् विष्णु ने उन्हें दर्शन दिए और उनको पूछा,"हे महाप्रतापी गरुड़! तुमको अमृत पीना है तो इस पात्र से अमृत पी लो, पूरा पात्र लेकर जाने की क्या आवश्यकता है?" गरुड़ ने भगवान् विष्णु को उत्तर दिया,"मुझे ये अमृत स्वयं के लिए नहीं चाहिए अपितु मेरी माता को शाप से मुक्ति दिलाने के लिए चाहिए।"

गरुड़ के मन में अमृत के लिए कोई भी लालच ना देखकर भगवान् विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने गरुड़ से एक वर माँगने को कहा। गरुड़ ने कहा,"भगवान्! आप मुझे बिना अमृत पान के ही अमर कर दीजिये और मेरे प्रतिबिम्ब को अपनी ध्वजा में स्थान दीजिये।" भगवान् ने तथास्तु कहकर गरुड़ की इच्छा पूरी कर दी। 

इस पर गरुड़ ने भगवान् से कहा,"हे भगवान्! मैं भी आपको कुछ देना चाहता हूँ। आपकी जो भी इच्छा हो माँग लीजिये।"

भगवान् गरुड़ से बोले,"सभी इच्छाएँ मुझसे ही शुरू होकर, मुझमें ही समाप्त होती हैं। स्वयं लक्ष्मी मेरी धर्मपत्नी हैं। फिर भी तुम्हारी इस भावना का मैं आदर करता हूँ और चाहता हूँ की तुम ही मेरे वाहन बनो।"

गरुड़ भगवान् विष्णु को तथास्तु बोलकर उनकी अनुमति लेकर अमृत पात्र के साथ वहाँ से आगे बढ़े। अब तक इन्द्र की मूर्छा भी भंग हो चुकी थी और उन्होंने जब गरुड़ को अमृत पात्र के साथ उड़ते हुए देखा तो अपने वज्र से उन पर प्रहार किया। जब वज्र के प्रहार से गरुड़ को कोई भी हानि नहीं हुई तो इन्द्र ने गरुड़ से कहा,"पक्षिराज! आप इतने पराक्रमी और बलशाली हैं। मुझे आपसे शत्रुता नहीं मित्रता चाहिए।"

गरुड़ ने इन्द्र की मित्रता श्वीकार कर ली। उसके बाद इन्द्र ने गरुड़ से निवेदन किया,"यदि आपको इस अमृत की आवश्यकता नहीं है तो ये हमें वापस दे दीजिये क्योंकि आप जिस किसी को भी यह अमृत देंगे वो लोग हमें बहुत हानि पहुचाएंगे।"

गरुड़ ने इन्द्र को अपनी माता की नागमाता कद्रू के साथ लगी बाजी और उसके परिणामस्वरूप उनकी माता के दासत्व की बात बता दी। इन्द्र ने गरुड़ को बताया कि किस प्रकार विनता ने नागों के छल के कारण बाजी हारी थी। 

गरुड़ को नागों पर अत्यंत क्रोध आया और उन्होंने निर्णय लिया कि अब से ये नाग ही उनका भोजन बनेंगे। उन्होंने इंद्रदेव से कहा,"देवराज! मैं यह पात्र नागों को सौंपकर अपनी माता को दासत्व से मुक्त करा लूँगा, उसके बाद उनके अमृत पान से पहले ही आप उसे वहाँ से उठाकर वापस स्वर्गलोक लें आइयेगा।"

इस प्रकार इन्द्र से सहमति होने के बाद गरुड़ अमृतपात्र लेकर नागों के पास गए और उनसे अपनी माता को दासत्व से मुक्त करने को कहा। नागों ने विनता को दासत्व से मुक्त कर दिया। 

जब नागों ने अमृतपान करने की सोची तो गरुड़ ने अमृतपात्र को कुशों पर रखते हुए कहा,"अमृत तो यहीं रखा है। तुम लोग इसे पीने में जल्दी मत करो। पहले स्नान कर पवित्र हो जाओ उसके बाद पवित्र शरीर और मन से अमृत का पान करना।"

गरुड़ भगवान् विष्णु को तथास्तु बोलकर उनकी अनुमति लेकर अमृत पात्र के साथ वहाँ से आगे बढ़े। अब तक इन्द्र की मूर्छा भी भंग हो चुकी थी और उन्होंने जब गरुड़ को अमृत पात्र के साथ उड़ते हुए देखा तो अपने वज्र से उन पर प्रहार किया। जब वज्र के प्रहार से गरुड़ को कोई भी हानि नहीं हुई तो इन्द्र ने गरुड़ से कहा,"पक्षिराज! आप इतने पराक्रमी और बलशाली हैं। मुझे आपसे शत्रुता नहीं मित्रता चाहिए।"

गरुड़ ने इन्द्र की मित्रता श्वीकार कर ली। उसके बाद इन्द्र ने गरुड़ से निवेदन किया,"यदि आपको इस अमृत की आवश्यकता नहीं है तो ये हमें वापस दे दीजिये क्योंकि आप जिस किसी को भी यह अमृत देंगे वो लोग हमें बहुत हानि पहुचाएंगे।"

गरुड़ ने इन्द्र को अपनी माता की नागमाता कद्रू के साथ लगी बाजी और उसके परिणामस्वरूप उनकी माता के दासत्व की बात बता दी। इन्द्र ने गरुड़ को बताया कि किस प्रकार विनता ने नागों के छल के कारण बाजी हारी थी। 

गरुड़ को नागों पर अत्यंत क्रोध आया और उन्होंने निर्णय लिया कि अब से ये नाग ही उनका भोजन बनेंगे। उन्होंने इंद्रदेव से कहा,"देवराज! मैं यह पात्र नागों को सौंपकर अपनी माता को दासत्व से मुक्त करा लूँगा, उसके बाद उनके अमृत पान से पहले ही आप उसे वहाँ से उठाकर वापस स्वर्गलोक लें आइयेगा।"

इस प्रकार इन्द्र से सहमति होने के बाद गरुड़ अमृतपात्र लेकर नागों के पास गए और उनसे अपनी माता को दासत्व से मुक्त करने को कहा। नागों ने विनता को दासत्व से मुक्त कर दिया। 

जब नागों ने अमृतपान करने की सोची तो गरुड़ ने अमृतपात्र को कुशों पर रखते हुए कहा,"अमृत तो यहीं रखा है। तुम लोग इसे पीने में जल्दी मत करो। पहले स्नान कर पवित्र हो जाओ उसके बाद पवित्र शरीर और मन से अमृत का पान करना।"


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