शर्मिष्ठा, देवयानी और ययाति की कथा 

दानवराज वृषपर्वा की पुत्री थी शर्मिष्ठा। जो कि देवयानी की ही आयु की थी। एक दिन शर्मिष्ठा अपनी सखियों के साथ सरोवर के किनारे जलक्रीड़ा के लिए जा रही थी। उसने देवयानी से भी साथ चलने को कहा। देवयानी राजकन्या और उनकी सहेलियों के साथ चली गयी। वहाँ देवयानी और शर्मिष्ठा के कपड़ों की अदला-बदली हो जाने से दोनों में झगड़ा हो गया। 

देवयानी ने शर्मिष्ठा और उसके पिता को बुरा भला कहा तो शर्मिष्ठा ने देवयानी को कुएं में धक्का दे दिया और अपनी सखियों के साथ राजमहल वापस चली गयी। 

उसी समय चंद्रवंशी महाराज नहुष और पार्वती जी की पुत्री अशोकसुन्दरी के पुत्र महाराज ययाति जंगल से गुजर रहे थे और पानी पीने के लिए कुएं पर रुके। उन्होंने कुएं के अंदर से देवयानी की आवाज़ सुनी और उसे बाहर निकाला। देवयानी ने ययाति से कहा,"महाराज! मैं गुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी हूँ। आपने मेरा हाथ पकड़कर मेरी जान बचायी है, अब आप ही मेरा वरण कीजिये।" ययाति ने देवयानी के इस प्रस्ताव का उत्तर देते हुए कहा,"देवी! कहाँ आप ब्राह्मणश्रेष्ठ गुरु शुक्र की पुत्री और मैं एक क्षत्रिय। हमारा मिलन कैसे संभव है?" 

देवयानी जब आश्रम वापस पहुँची तो उसने अपने पिता को शर्मिष्ठा से हुए झगड़े के बारे में बड़ा चढ़ाकर बताया। उसने बताया कि किस प्रकार शर्मिष्ठा ने उनको उसके पिता के संरक्षण में पलने वाला उनका सेवक कहा। गुरु को इस बात पर बहुत क्रोध आया और उन्होंने वृषपर्वा का राज्य छोड़कर जाने का निर्णय कर लिया। जब इस बात का समाचार दानवराज को मिला तो उन्होंने गुरु के सामने हाथ जोड़कर उनसे ना जाने की विनती की। दानवराज के बार-बार निवेदन करने पर शुक्राचार्य ने इस बात का निर्णय अपनी पुत्री देवयानी पर छोड़ दिया। देवयानी ने कहा कि अगर शर्मिष्ठा जीवन भर उसकी दासी बनकर रहे तो ही गुरु शुक्र दानवों के साथ रह सकते हैं। शर्मिष्ठा ने अपने पिता और कुल की भलाई का सोचकर देवयानी की शर्त मान ली और उसकी दासी बनकर आश्रम में रहने लगी।

एक दिन देवयानी अपनी दासियों के साथ उसी जंगल में विहार करने गयी हुई थी कि उसी समय महाराज ययाति भी वहाँ पहुँच गए। देवयानी ने ययाति से कहा,"महाराज! आप पहले पुरुष हैं जिसने मेरा हाथ पकड़ा है। अब आप ही मुझे स्वीकार करिये।" ययाति ने फिर से देवयानी से पहले कही हुई बात दोहरा दी,"देवी आप ब्राह्मण श्रेष्ठ शुक्राचार्य की पुत्री हैं और मैं एक क्षत्रिय। आपके पिता इस मिलन की स्वीकृति नहीं देंगे।"

उस दिन आश्रम वापस आने पर देवयानी ने अपने पिता से अपने मन की बात कही,"पिताश्री! उस दिन कुएं से बचाते हुए महाराज ययाति ने मेरा हाथ पकड़ा था। तब से ही मैंने उन्हें वरण करने की सोच ली थी। आप उनसे मेरा विवाह कर दीजिये।" अपनी पुत्री की इच्छा जानकर और कच के शाप को ध्यान में रखकर शुक्राचार्य देवयानी के विवाह का प्रस्ताव लेकर ययाति के पास गए। 

ययाति ने गुरु शुक्र का प्रस्ताव सुनकर उनकी बात मान ली और उनका विवाह देवयानी के साथ हो गया। शर्मिष्ठा भी देवयानी के साथ उसकी दासी के रूप में आ गयी। ययाति ने देवयानी के कहने पर शर्मिष्ठा के लिए एक अलग महल बनवा दिया, जहाँ शर्मिष्ठा रहने लगी। 

एक दिन शर्मिष्ठा ययाति से बात करने लगी और उसने ययाति को बताया कि वह दानवराज वृषपर्वा की पुत्री है और किस प्रकार देवयानी की जिद के कारण उसे उसकी दासी बनकर रहना पड़ रहा है। ययाति को शर्मिष्ठा की बात सुनकर उसके साथ सहानुभूति हुई। शर्मिष्ठा ने ययाति से उसको अपनाकर पत्नी के समान स्थान देने की विनती की। ययाति शर्मिष्ठा जैसी सुंदरी को मना नहीं कर पाए और देवयानी से छुपकर शर्मिष्ठा से मिलने लगे। 

कुछ समय बीतने के बाद ययाति को देवयानी से यदु और तुर्वसु नामक दो पुत्र हुए और शर्मिष्ठा से द्रुह्यु, अनु और पुरु नामक तीन पुत्र हुए। 

एक दिन ययाति देवयानी के साथ बगीचे में घूम रहे थे कि देवयानी ने शर्मिष्ठा को उसके पुत्रों के साथ खेलते हुए देखा। उसने शर्मिष्ठा के पुत्रों से उनके पिता का नाम पूछा तो उन्होने ययाति की ओर उंगली कर दी। देवयानी क्रोध से व्याकुल हो गयी और ययाति को छोड़कर अपने पिता के आश्रम चली गयी। 

वर्षों बाद गुरु शुक्राचार्य जब हिमालय में अपना तप संपन्न कर वापस लौटे तो देवयानी को देखकर उसके आश्रम में रहने का कारण पूछा। देवयानी ने ययाति के शर्मिष्ठा के साथ सम्बन्ध और उससे हुए पुत्रों की बात अपने पिता को बता दी। ययाति जब देवयानी को लेने के लिए शुक्राचार्य के आश्रम पहुँचे तो उन्होंने ययाति को वृद्धावस्था का शाप दे दिया। ययाति के अत्यधिक विनती करने पर गुरु शुक्र ने कहा की ययाति का कोई पुत्र अगर स्वेच्छा से उनकी वृद्धावस्था ले ले तो उनके पुत्र की युवावस्था उनको मिल जाएगी। 

ययाति ने अपने पांचों पुत्रों को बुलाकर उनको शुक्राचार्य के शाप के विषय में बताया और उनसे उनकी युवावस्था माँगी। ययाति से पहले चार पुत्रों ने ययाति के प्रस्ताव को मना कर दिया परन्तु सबसे छोटे पुत्र पुरु ने ययाति का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। 

अपने पुत्र की युवावस्था लेकर ययाति ने वर्षों तक सांसारिक जीवन के सुखों का भोग किया। अंततः ययाति को ज्ञान की प्राप्ति हुई की सांसारिक सुखों की लालसा कभी ख़तम नहीं होती। सच्चा सुख इनका भोग करने में नहीं अपितु त्याग करने में है। ऐसा सोचकर उन्होंने अपने पुत्र पुरु को उसका यौवन वापस लौटा दिया और उसको अपना उत्तराधिकारी बनाकर सन्यास ग्रहण कर लिया। वर्षों तक योगी का जीवन व्यतीत करने के पश्चात् ययाति को स्वर्गलोक की प्राप्ति हुई। 

ययाति के ज्येष्ठ पुत्र यदु से ही यादव कुल की स्थापना हुई जिसमे आगे चलकर भगवान् श्रीकृष्ण ने जन्म लिया। ययाति ने जिस पुरु को अपना उत्तराधिकारी बनाया था उसी कुल में आगे चलकर दुष्यंत, भरत, शांतनु, भीष्म, धृतराष्ट्र और पाण्डु तथा कौरव और पांडवों का जन्म हुआ।


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